बेतवा बहती रही
बेतवा बहती रही एक बेतवा! एक मीरा ! एक उर्वशी ! नही-नहीं, यह...
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बेतवा बहती रही एक बेतवा! एक मीरा ! एक उर्वशी ! नही-नहीं, यह अनेक उर्वशियों, अनेक मीराओं, अनेक बेतवाओं की कहानी है । बेतवा के किनारे जंगल की तरह उगी मैली बस्तियों । भाग्य पर भरोसा रखने वाले दीन-हीन किसान । शोषण के सतत प्रवाह में डूबा समाज । एक अनोखा समाज, अनेक प्रश्नों, प्रश्नचिन्हों से घिरा । प्राचीन रूढियां है जहाँ सनातन । अंधविश्वास हैं अंतहीन । अशिक्षा का गहरा अंधियारा । शताब्दियों से चली आ रही अमानवीय यंत्रणाएँ । फिर जीने के लिए कोई किंचित ठौर खोजे भी तो कहाँ ! हाँ, इन अंधेरी खोहों और खाइयों में कभी-कभी मुट्ठी-भर किरणों के प्रतिबिंब का अहसास भी कितना कुछ नहीं दे जाता । उर्वशी का दु:ख है कि वह उर्वशी है । साधारण में भी असाधारण । इसीलिए सब तरह से अभिशप्त रही । तिल-तिल मिटती रही चुपचाप । प्रेम, वासना, हिंसा, घृणा से भरी एक हृदयद्रावक अछूती कहानी ! पूरे एक अंचल को व्यथा-कथा ।
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- Edition:1. saṃskaraṇa, 1. saṃskaraṇa, 1. saṃskaraṇa, 1. saṃskaraṇa, 1. saṃskaraṇa, 1. saṃskaraṇa, 1. saṃskaraṇa, 1. saṃskaraṇa, 1. saṃskaraṇa, 1. saṃskaraṇa, 1. saṃskaraṇa, 1. saṃskaraṇa, 1. saṃskaraṇa, 1. saṃskaraṇa, 1. saṃskaraṇa, 1. saṃskaraṇa, 1. saṃskaraṇa
- Language:
- ISBN10:8170161398
- ISBN13:9788170161394
- kindle Asin:8170161398









